मंगलवार, 9 अगस्त 2011

रात भर |


रात भर
मैं भी जागा
तुम भी जागी
रात भर
राह देखी
तुम ने मेरी
मैं तुम्हारी,
तुम ना आईं
मैं भी तुम तक
जा ना पाया
वक़्त दोनो ने गवाया
रात भर |

रात भर
आग भड़की,
बुझ गयी,
राख बनकर |
रात भर
बात निकली,
तुम ने भी की
हम ने भी की.
ना मेरी
तुम तलक पहुँची,
ना तेरी
मुझ तलक पहुँची,
रात भर |

राजीव जायसवाल
०९/०८/२०११

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  2. स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ।

    कल 17/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. बढ़िया ....अच्छा लगा आपकी यह रचना पढ़ कर

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर ....मन की वेदना ...बहुत अच्छे से दर्शायी है ...!!

    जवाब देंहटाएं
  5. रात भर
    आग भड़की,
    बुझ गयी,
    राख बनकर |
    रात भर
    बात निकली,
    तुम ने भी की
    हम ने भी की.
    ना मेरी
    तुम तलक पहुँची,
    ना तेरी
    मुझ तलक पहुँची,
    रात भर |
    waah bahut khobb rat bhi beet gayi aur baat bhi .....sunder prastuti .aabhar

    जवाब देंहटाएं
  6. धन्यवाद, निधि जी, मेरी अन्य रचनाओं पर भी अपनी राय दें |

    जवाब देंहटाएं