शनिवार, 30 जुलाई 2011

आम आदमी हूँ मैं, पर सुखी हूँ |


उस का घर जैसे महल है

स्वीमिंग पूल है

बाग है

झरना भी है

और लिफ्ट भी



उस की पत्नी

रूप की रानी

क्या जवानी है

फिगर है जैसे

मूरत हो संगमरमर की



उस के बच्चे

हर बात में आगे

अमेरिका में पढ़ते

अँग्रेज़ी में ही बात हैं करते |



मैं

मेरा परिवार क्या

भोली सी पत्नी

छोटा सा एक घर

मेरे बच्चे

पास के स्कूल में पढ़ते

हिन्दी में ही

बात हैं करते

मेरा अस्तित्व क्या

एक साधारण आदमी हूँ

पर मैं सुखी हूँ |



मेरी पत्नी

राह तकती

शाम को

आता मैं जब घर

प्यार से खाना खिलाती

फिर सुबह से शाम के

क़िस्से सुनाती

मेरे बच्चे

हैं मेरी आँखों के तारे

रात के चंदा

दिन के उजियारे |

मुझे वो पूजते हैं

देवता हूँ मैं

उन के लिए |



मेरे कुछ दोस्त हैं

जो दिन रात हाज़िर हैं

मेरे सुख में

मेरे दुख में

वे मेरा मान हैं

मैं उन की जान हूँ |



बहुत खुश हूँ

मैं अपनी जिंदगी से

सब मिला मुझ को

प्यार भी, संसार भी

परिवार भी |



राजीव जायसवाल

१९/१०/२०१०



THIS POEM IS PRESENTED BELOW IN ROMAN SCRIPT------



US KA GHAR

JAISE MAHAL HAI

SWEEMING POOL HAI

BAGH HAI

JHARNA BHI HAI

AUR LIFT BHI.



US KI PATNI

ROOP KI RANI

KYA JAWANI

FIGURE JAISE

SANGEMARMAR.



US KE BACHHE

HAR BAAT MEIN AGEY

AMERICA MEIN PADHTE

ANGREZI MEIN BAAT KARTEY.



MAIN

MERA PARIVAR KYA

BHOLI SI PATNI

CHOTA SA EK GHAR

MERE BACHHEY

PAS KE SCHOOL MEIN PADHTEY

HINDI MEIN HAI

BATEIN KARTE.

MERA ASTITVA KYA

EK SADHARAN ADAMI HUIN

PAR SUKHI HUN.



MERI PATNI

RAH TAKTI

SHAM KO ATA

MAIN JAB GHAR

PYAR SE KHANA KHILATI

PHIR SUBHA SE SHAM KE

KISSE SUNATI

MERE BACHHEY

HAIN MERI

ANKHON KE TAREY

RAAT KE CHANDA

DIN KE UJIYARE

MUJHE VO PUJTE HAIN

DEVTA HUN MAIN

UN KE LIYE.



MERE KUCH DOST HAIN

JO DIN RAAT HAZIR HAIN

MERE SUKH MEIN

MERE DUKH MEIN

MERA VO MAAN HAIN

MAIN UN KI JAAN HUN.



BAHUT KHUSH HUN

MAIN APNI JINDAGI SE

SAB MILA MUJH KO

PYAR BHI

SANSAR BHI

PARIVAR BHI.



RAJIV JAYASWAL

20/10/2010











गुरुवार, 28 जुलाई 2011

हरि, हरि, हरि |


हर जगह

हरि

हर समय

हरि

हर रात

हरि

हर दिवस

हरि



हर बोल

हरि

हर मौन

हरि

हर दशा

हरि

हर दिशा

हरि



हर देश

हरि

हर भेष

हरि

हर जीत

हरि |

हर हार

हरि |



हरि, हरि, हरि

हरि, हरि, हरि

हर ओर हरि

हर छोर हरि

बस हरि, हरि

हरि, हरि, हरि

राजीव जायसवाल

२९/०७/२०११

















मंगलवार, 26 जुलाई 2011

अपना बचपन मत बिसराना |



मेरे बच्चे

तुम मेरी उंगली पकड़

चलते थे, गिरते थे

लड़खड़ाते थे

संभलते थे |



मेरी

तुम गोद में आकर

मचलते थे, लड़ाते थे

तोतली बोली में

तुम मुझे

गिनती सुनाते थे |



मैं

तुम्हें देता खिलौने

घोड़ा, मोटर और हाथी

पर तुम मेरे खिलौने थे |

पीठ पर मेरी

तुम बैठकर

मुझे घोड़ा बनाते थे.

मैं समझता

खिलाता मैं तुम्हें हूँ,

अब समझ आया

की तुम मुझ को खिलाते थे |



होते तुम बीमार

हम सारी रात जगते,

तुम्हारा चेहरा तकते

दुआ मलिक से ये करते

हम को कर दे तू बीमार

तुम को ठीक कर दे |



अब

बड़े तुम हो गए हो

अपनी दुनिया

खो गए हो

तुम को जब

मैं देखता हूँ

मुझे लगता है

तुम वही हो

मगर

अब गोद मेरी छोटी है

और

तुम बड़े हो |



राजीव जायसवाल

मेरी यह रचना मेरे बेटों व्योम और विभोर को समर्पित है |

मेरी यह कविता उन सब माता पिता को समर्पित है, जिन की गोद छोटी हो गई है और बच्चे बड़े हो गए हैं |

THIS POEM IS PRESENTED BELOW IN ROMAN VERSION----------



MERE BACHHE

TUM MERI

UNGLI PAKAD

CHALTE THE, GIRTE THE

LADKHADATE THE

SAMBHALTE THE .



MERI

TUM GODE MEIN AKAR

MACHALTE THE, LADATE THE

TOTLI BOLI MEIN

TUM MUJHE

GINTI SUNATE THE.



MAIN

TUMHEIN DETA KHILONE

GHODA. MOTOR AUR HATHI

PAR TUM MERE KHILONE THE

PITH PAR MERI

TUM BAITH KAR

MUJHE GHODA BANATE THE

MAIN SAMAJHTA THA

KHILATA MAIN HUN TUM KO

AB SAMAJH AYA

KI TUM MUJH KO KHILATE THE.



HOTE TUM BIMAR

HUM SARI RAAT JAGTE

TUMHARA CHEHRA TAKTE

DUA MALIK SE YE KARTE

HUM KO KAR DE TU BIMAR

TUM KO THEEK KAR DE.



AB

BADE TUM HO GAE HO

APNI DUNIYA

KHO GAE HO

TUM KO JAB DEKHTA HUN

MUJHE LAGTE HO

VAHI TUM

PAR GODE MERI

CHOTI HO GAYI HAI

AUR BADE TUM HO GAYE HO.



RAJIV JAYASWAL

11.11.2010

THIS POEM IS DEDICATED TO MY LOVING CHILDREN VYOM AND VIBHORE.

THIS POEM IS DEDICATED TO ALL PARENTS.

THIS POEM IS DEDICATED TO ALL CHILDREN.



















रात भर जागने से कभी जागरण नहीं होता


रात भर जागने से

कभी जागरण नहीं होता

चीख कर भजने से

कभी जागरण नहीं होता

जागरण का अर्थ

जीवन समर में जागना है

जागरण का अर्थ

मन के भंवर में जागना है |



कहता है वो मिल अकेले में

ढूड्ता उस को तू मेले में

रात भर वो तकता तेरी बाट

तू जमाने को दिखाता ठाठ |



रात भर जागो ना जागो

भोर का उजियारा मन भर लो

ज्ञान का प्रसाद पाने को

अपनी झोली साफ तो कर लो |



जगराता मन का करो

प्रेम जीवन में भरो,

दीप, सूरज का है

नभ की थाली में,

आरती मन में करो

हर पहर जगराता करो |



राजीव जायसवाल

सोमवार, 25 जुलाई 2011

कब जगोगे |


कब जगोगे

धर्म के नाम पर कब तलक

सब को ठगोगे ,खुद को ठगोगे |

जागरण ऐसे करो

फिर ना सोना हो

जागरण ऐसे करो

आँख के आगे हर पल प्रभ सलोना हो |

जागरण ऐसे करो

तुम भी जागो सब भी जागें |

जागरण ऐसे करो

हो दूर अंधियारा मनो का

सत्य को समझो |

करो तुम जागरण हर पल

,ना जाने एक पल के बाद

कहीं तुमऐसे सो जाओ

कभी फिर जागरण ना हो |

मैं भी छोटा था कभी |


मैं भी छोटा था कभी ,

कर आँख बंद

सारे दिन सोता था ,

रातों को रोता था,

माँ का दुलारा था,

पिता का प्यारा था,

मैं भी छोटा था कभी |



रूई सा हल्का था

मोम सा मुलायम था

पालने में सोता था

गोदी लो, रोता था

दादी का प्यारा था

दादा का दुलारा था

मैं भी छोटा था कभी |

अब कुछ भी याद नहीं

जैसे मैं था ही नहीं

सब कुछ ही बदल गया

सब कुछ ही नया नया

दादी भी कहीं नहीं

दादा भी नहीं कहीं

फिर भी ये सुनो सभी

मैं भी छोटा था कभी |



राजीव जायसवाल

२३/०७/२०११

१०.०० रात्रि































दोपहरी में |


चाँद छत पे निकल आया

दोपहरी में

चाँद तुम से मिलने आया

दोपहरी में

चाँद, सूरज से भी लड़ बैठा

दोपहरी में

चाँदनी सारी लुटा बैठा

दोपहरी में |



चाँद , खुद को ही तपा बैठा

दोपहरी में

चाँद ,बस तुम से मिलने आया

दोपहरी में

चाँद, सूरज ना समझ लेना

दोपहरी में|



























शनिवार, 23 जुलाई 2011

प्रीत |


तोरी प्रीत सखी

मोहे लागे भली

मोरी प्रीत को

रीत से ज़ोरियो ना

डोरी नैन से नैन

के बीच खिंची

मोरी प्रीत की डोरी को

तोरियो ना |

दादी |

बचपन में

दादी के पास

मैं सोता था,

कभी दूर

दादी से होता

रात अकेला

मैं रोता था,

आँसुओं से

तकिया भिगोता था |



रात में

दादी

मुझे क़िस्से सुनाती थी,

भूली बिसरी

बातें बताती थी,

उस की बातें

थी मेरी लोरी ,

सुनते सुनते

था मैं सो जाता,

नींद की दुनिया में

खो जाता |



एक दिन

जो बात ना होती ,

दादी

आकर पूछती मुझ से,

ठीक तो है

आज बोला ही नहीं मुझ से ,

तेरी आवाज़ बिन सुन

रह नहीं पाती ,

मेरे बच्चे

तू मुझ से दूर हो

मैं सह नहीं पाती |



एक दिन

दादी

अकेले सो गयी ,

फिर नहीं जागी

कहीं पर खो गयी |





तब से अब तक

हो गए बरसों ,

मेरी दुनिया

बहुत बदली ,

मेरा एक घर बना

प्यारी सी पत्नी मिली

फूल से बच्चे हुए ,

मैं व्यस्त

इतना हो गया ,

दूसरी दुनिया में

जैसे खो गया |



अचानक

आज मुझ को याद आई ,

बहुत दिन के बाद

दादी ,

आज फिर

मैं रो रहा हूँ ,

नयन जल से

आज फिर

तकिया भिगो रहा हूँ |



राजीव जायसवाल

१५/०१/२०११

यह कविता मैं अपनी दादी को समर्पित करता हूँ |

THIS POEM IS PRESENTED BELOW IN ROMAN SCRIPT----

Bachpan mein

Dadi ke pas

Main sota tha

Kabhi dur dadi se hota

Rat akela

Main rota tha

Ansuon se

Takiya bhigota tha.



Rat mein

Dadi mujhe

Kisse sunati thi

Bhuli bisri

Batein batati thi

Us ki batein

Thi meri lori

Sunte sunte

Tha main so jata

Nind ki duniya

Mein kho jata.



Ek din jo

Bat na hoti

To dadi

Ake mujh se

Puchti thi

Thik to hai

Aj bola hi nahin mujhe

Bat kya hai

Teri awaz

Bin sun

Rah nahin pati

Mere bachhe

Main tujh se duri ko

Bas sah nahin pati.



Ek din

Dadi

Akele so gai

Phir nahin jagi

Kahin par kho gai





Tab se ab tak

Ho gaye barson

Meri duniya

Bahut badli

Mera ek ghar bana

Pyari si patni

Phool se bachhe

Bahut se kam

Ghar ke

Bahar ke



Achanak

Aj mujh ko yad ayi

Bahut din ke bad

Dadi ki

Aj phir main

Ro raha hun

Nayan jal se

Aj phir

Takiya bhigo raha hun.



RAJIV JAYASWAL

15/01/2011

THIS POEM IS DEDICATED TO MY GRANDMOTHER.

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

कान्हा किस को मिल पाता है |


कान्हा

किस को मिल पाता है

राधा का

मीरा का

जिस जिस ने प्यार किया

उस उस का

हो जाता है

नज़र नहीं आता है

पर दूर नहीं जाता है |

वो जगह बता दे जहाँ पर खुदा ना हो |


उस में भी तू नज़र आता है

मुझ में भी तू नज़र आता है

मुझ में मैं देखता उस को

और उस में मैं दिखाई देता है

|

खुद में खुदा को देख लेता हूँ

खुदा , खुद में दिखाई देता है

या खुदा, बंदगी करूँ किस की

हर जगह तू दिखाई देता है |



खुद में उस की बंदगी करने लगा

या खुदा, मैं बुत परस्ती करने लगा

नमाजे चार की पाबंदगी को छोड़ कर

हर घड़ी आवारगी करने लगा |



मौलवी की मज़हबी को भूल कर

मैं किशन की बाँसुरी सुनने लगा

पंडितों की आरती को भूल कर

खुद के अंदर आरती सुनने लगा |

राजीव जायसवाल

२०/०७/२०१०

मुल्ला, शराब पीने दे, मस्जिद में बैठ कर, या वो जगह बता दे जहाँ पर खुदा ना हो |



















मंगलवार, 19 जुलाई 2011

वो मर के भी मुझे भूल नहीं पाते हैं |


वो मर के भी

मुझे भूल नहीं पाते हैं

किसी अंजान जगह से

मुझे वो बुलाते हैं

जीते जी कह ना पाए हाले दिल

अब जनाज़े से

हाल दिल का सुनाए जाते हैं

क्या ऐसा प्यार

कहीं देखा है

मरते मरते भी

वो मुझ पे मरे जाते हैं |



क्या पता

कौन सी दुनिया में

वो होंगे राजीव

मेरी दुनिया को

वो भूल नहीं पाते हैं |

मेरे आँसू ना बहें

इस की उन को

फ़िक्र बहुत

दूर जन्नत में भी

वो चैन नहीं पाते है |



उन की यादों का

जनाज़ा उठाए फिरते हैं

कभी रुमाल, कभी ख्याल

कभी सवाल उन का

दिल में लिए फिरते हैं |

जो पहले जानते

वो हमसे प्यार हैं करते

खुदा कसम है

हम उन को ना मरने देते |

राजीव जायसवाल

१७/११/२०१०

ना मेरी , मैं रहे |


मरना क्या है

जीना क्या है

मिलना और

बिछड़ना क्या है

आना क्या है

जाना क्या है

खोना क्या है

पाना क्या है

नाम जपन से

क्या होता है

हर सिमरन से

क्या होता है|



मेरा मन

बिल्कुल अज्ञानी

जिसने कही

उसी की मानी

अब थक गया

मैं इन बातों से

सोया नहीं

कई रातों से

किस विध से

सब भ्रम

मिट जाएँ

ना मैं रहूं

ना मेरी

मैं रह जाए |



मेरे भीतर

राम रमय्या,

मेरे भीतर

कृष्ण कन्हय्या,

मेरे भीतर

मथुरा काशी,

मेरे भीतर

घट घट वासी,

फिर काहे

मैं बन बन जाउँ,

तीरथ तीरथ

ढोक लगाउँ,

मीत मेरा

मुझ ही में वासा,

काहे फिर मैं

इत उत जासा |



राजीव जायसवाल

मन कहता है |


मेरा मन

कहता है मुझ से

बार बार,

उस का कर आलिंगन

उस का ही

कर वरण,

जिस का

ना है जनम

ना ही जिस का मरण |



जो अनादि और अनंत

जिस का

ना है प्रारंभ,

ना ही जिस का है अंत,

मेरा मन

कहता है मुझ से

बार बार |



जिस के

ये दिग-दिगंत

जिस के

ये पहर चार

जिस के

ये रात भोर

जिस का

चहूँ ओर शोर

उस से ही

रख संबंध

उस से ही

रख व्यवहार |



उस का ही

मंथन कर,

उस का ही

कर विचार,

उस का ही

पूजन कर,

उस का ही

कर प्रचार,

अगम, सुगम,निर्विकार,

महत जिस की

लिख ना सके,

कोई भी रचनाकार,

मेरा मन

कहता है मुझ से

बार बार |



राजीव जायसवाल

०५/१२/२०१०


हम क्या हैं

अस्थि और माँस,

जिस में चलती

हर पल सांस,

हृदय धड़कता है

दिन रैन,

पलक झपकते हैं

दो नैन |



मनवा सोचे बारंबार

जीवन का अद्भुत व्यवहार ,

दो हाथों से

करते काम,

पैर चलत हैं

सुबह शाम |



हृदय स्थल में

बसते प्राण,

ध्वनि को सुनते

दो कान,

जिव्हा से

वाणी व्यवहार,

भाव, कामना

प्रेम, विचार,

इन सब का

मनवा आधार |



कैसा अद्भुत

मानव यंत्र,

अंधकूप होता निर्माण,

नौ माहों तक

चलता काम |



कौन बनाया

मानव यंत्र,

जिस में फूका

जीवन मंत्र,

सब अचरज का कारोबार ,

कौन रचियता

कौन कुम्हार,

सदियों से सब

करें विचार |



राजीव जायसवाल

१६/१२/२०१०



सोमवार, 18 जुलाई 2011

मैं मिलूँगा एक दिन तुम को |


मैं मिलूँगा

एक दिन तुम को

मुझे फिर जाने मत देना

छिपा लेना कहीं पर

अपनी ज़ुल्फो में

या होठों में

या कहीं भी

जहाँ पर

मैं भी खुद को

ढूँढ ना पाउँ

कभी फिर

दूर तुम से

जा ना पाउँ |



वफ़ा मुझ में

ज़रा कम है

अपना भरोसा

मुझे कम है

अभी तो

मैं तुम्हारा हूँ

कल किसी का

हो ना जाउँ

मैं कहीं पर

खो ना जाउँ

मुझ को छुपा लो

तुम

कहीं भी

जहाँ पर

खुद से भी

मैं मिल ना पाउँ

तुम्हारा

बस तुम्हारा

ही रहूं

तुम में ही

खो जाउँ

तुम्हारे साथ जागूं

तुम्हारे साथ सो जाउँ |



राजीव जायसवाल

१८/०७/२०११

























रविवार, 17 जुलाई 2011

मन कहता है


मेरा मन

कहता है मुझ से

बार बार,

उस का कर आलिंगन

उस का ही

कर वरण,

जिस का

ना है जनम

ना ही जिस का मरण |



जो अनादि और अनंत

जिस का

ना है प्रारंभ,

ना ही जिस का है अंत,

मेरा मन

कहता है मुझ से

बार बार |



जिस के

ये दिग-दिगंत

जिस के

ये पहर चार

जिस के

ये रात भोर

जिस का

चहूँ ओर शोर

उस से ही

रख संबंध

उस से ही

रख व्यवहार |



उस का ही

मंथन कर,

उस का ही

कर विचार,

उस का ही

पूजन कर,

उस का ही

कर प्रचार,

अगम, सुगम,निर्विकार,

महत जिस की

लिख ना सके,

कोई भी रचनाकार,

मेरा मन

कहता है मुझ से

बार बार |



राजीव जायसवाल

०५/१२/२०१०

सुख क्या , दुख क्या |


सुख क्या है

दुख क्या है

मन की अवस्था है

सुख सोचा तो

सुख है

दुख सोचा तो

दुख है |



कभी हंसता है

कभी रोता है

खुशी से नाचता

ना फूला समाता है

नगाड़े ढोल बजवा कर

बड़े उत्सव मनाता है

सजी घोड़ी पे चढ़ता है

दुल्हनिया घर को लाता है |



कभी छाती उदासी है

घटा भी गम की छाती है

कभी दौलत निकलती है

कभी शोहरत फिसलती है

कभी इज़्ज़त नहीं रहती

तबाही साथ चलती है |

ना साथी साथ देते हैं

सभी बच कर निकलते हैं |



बहाने लाख होते हैं

कभी हँसने के, रोने के

समंदर आँसुओं से भर

खुदी को खुद डुबाने के |



जो सुख हो तो

ना पागल हो

जो दुख हो तो

दुखी ना हो

समन्व्य सुख से ,दुख से कर

रजा में उस की राज़ी हो

प्रभु की बंदगी को कर

ना सुख होगा, ना दुख होगा

ख़त्म सारा भ्रम होगा |

ख़त्म सारा भ्रम होगा |



राजीव जायसवाल



4/01/2011

THIS POEM IS PRESENTED BELOW IN ROMAN VERSION---

SUKH KYA HAI

DUKH KYA HAI

MANN KI AWASTHA HAI

DUKH SOCHO

DUKH HOGA

SUKH SOCHO

SUKH HOGA.



KABHI HANSTA

KABHI ROTA HAI

KHUSHI SE NACHTA

FULA NA SAMATA HAI

NAGADE DHOL BAJWA KAR

BADE UTSAV MANATA HAI

SAJI GHODE PAR CHADHTA HAI

DULHANIYA GHAR KO LATA HAI.



KABHI CHATI UDASI HAI

GHATA BHI GUM KO CHATI HAI

KABHI DAULAT NIKALTI HAI

KABHI SOHRAT FISALTI HAI

KABHI IZZAT NAHIN RAHTI

TABAHI SATH CHALTI HAI

NA SATHI SATH DETE HAIN

SABHI BACH KAR NIKALTE HAIN.



BAHANE LAKH HOTE HAIN

KABHI HANSNE KE

KABHI RONE KE

SAMUNDER ANSUON SE BHAR

KHUDI KO KHUD DUBONE KE.



JO SUKH HO

TO PAGAL NA HO

JO DUKH HO TO

DUKHI NA HO

SAMANVY SUKH SE

DUKH SE KAR

RAJA MEIN US KI RAJI HO

PRABHU KI BANDAGI KO KAR

NA SUKH HOGA

NA DUKH HOGA

KHATAM SARA BHARAM HOGA

KHATAM SARA BHARAM HOGA.



RAJIV JAYASWAL



my first poem of this year.



















कौन सृष्टि का सृजनहार |


इस धरती पर

कितने लोग ,

धूर्त, पाखंडी

मूरख ,मदहोश ,

योगी, रोगी

सुंदर, चोर |

दुखी, सुखी

ख़ुदग़र्ज़ और चोर |

संत , क्रूर

नादान ,कठोर |

कितने चेहरे

कितने रूप |

कितने मन

कितने हैं विचार

कितने पाप

कितने सद व्यवहार



अन गिन जीव

अन गिन जन्त ,

अनगिन विष धर ,

अन गिन मूढ़,

अन गिन चन्ट|

अन गिन रावण

अन गिन कन्स

अन गिन पापी

अनगिन संत |



प्रेमी , कामी

दुर्जन, व्यभिचारी ,

सती ,पति

सज्जन ,अत्याचारी ,

साधक, भक्षक

दीन भिखारी |



अगम, अगोचर

लोक, परलोक ,

सागर, पाताल

वाटिका अशोक |

स्वर्ग, नर्क

सूरज और चाँद

कोट ग्रह, कोट धाम

कोट सृष्ट , कोट ग्राम |

कितने सूरज

कितने चाँद

कितने तारे

इस ब्रह्मांड |





मन मूरख

ना समझे भेद

कहत थके

पुराण और वेद

रूप ना रंग

आकार , ना भार

ना सूक्षम, ना स्थूल

ना आदि, ना अंत |

कौन रचीयता

कौन कुम्हार

कौन सृष्टि

का सृजनहार |



राजीव जायसवाल

२४/०१/२०११



This poem is presented below in roman script------------



Is dharti par kitne log

Dhurt, pakhandi,

Murakh, madhosh

Yogi, rogi

Sundar, chor

Dukhi, sukhi

Khdgarz ghanghor

Sant, krurr

Nadan, kathor

Kitne chehre

Kitne rup

Kitne mann

Kitne hain vichar

Kitne paap

Kitne sadvyavhar .



Angin jiv

Angin jant

Angin mudh

Angin chant

Angin raven

Angin kans

Angin papi

Angina sant .



Premi ,kami

Durjan, vyabhichari

Sati , pati

Sajjan, atyachari

Sadhak, bhakshak

Deen, bhikhari.



Agam, agochar

Lok , parlok

Sagar, patal

Vatika ashok

Swarg, narak

Suraj aur chand.



Kot graham

Kot dham

Kot srishti

Kot gram.

Kot suraj

Kot chand

Kot tare

Kot brahmand.



Mann murakh

Na samjhe bhed

Kahat thake

Puran aur Ved

Rup na rang

Akar na bhar

Na suksham, na sthul

Na adi na anta.

Kaun rachiyta

Kaun kumhar

Kaun srishti ka

Srijanhar.



RAJIV JAYASWAL

एक धरती थी हरी भरी |


एक धरती थी

हरी भरी

पेड़ों से, फूलों से

भरी, भरी |

कुदरत भी मेहरबान थी

कल कल नदी

बहती थी,

अमृत जल से भरी

रहती थी ,

धरती से, अंबर तक

शुद्ध हवा

बहती थी,

एक धरती थी

हरी भरी |



मानव

पगला गया,

हरियाली

खा गया,

नदियों को

दूषित किया,

धरती से अंबर तक

सब कुछ

प्रदूषित किया,

धरती के सीने को

चीर फाड़ डाला,

क्या क्या कर डाला,

जीना खुद अपना

मुहाल कर डाला,

एक धरती थी

हरी भरी |



राजीव जायसवाल

THIS POEM IS PRESENTED BELOW IN ROMAN SCRIPT---

Ek dharti thi, hari hari

Pedon se phulon se bhari bhari

Kudrat bhi meharban thi

Jiv jantu sabhi vidyaman the

Kal kal nadi behti thi

Amrit jal se bhari rehti thi

Dharti se ambar tak sudhh vayu bahti thi

Ek dharti thi, hari hari….



Manav pagla gaya

Hariyali kha gaya

Nadiyon ko dushit kiya

Dharti se ambar tak sab kuch pradushit kiya

Dharti ke sine ko cheer phad dala

Kya kya kar dala

Jina khud apna muhal kar dala.

Ek dharti thi , hari bhari.



RAJIV JAYASWAL

13/02/2011



कौन दिशा से आए हो


कौन दिशा से

आए हो ,

कौन दिशा को

जाना है ,

कितने दिन को

आए हो ,

जाकर फिर कब

आना है ,

क्या कुछ लेकर

आए हो ,

क्या कुछ लेकर

जाना है |



कौन

तुम्हारे संबंधी ,

किन जन्मों का

नाता है ,

काहे

मोह किया सबसे ,

साथ कोई क्या

जाता है |



क्या

ऐसे ही आए थे ,

जैसे

तुम अब दिखते हो ,

चंदा सा

चेहरा लाए ,

कजरारे

नयना लाए ,

देवदूत सा बदन मिला ,

पर तुमने

क्या हाल किया |



कितने महल बनाओगे

क्या सब में

रह पाओगे ,

कितनी ज़मीं खरीदोगे ,

दो गज जगह ही पाओगे |



घर, बेटा

पत्नी , नाती ,

संग, सखा

मितवा , साथी ,

सब पर बहुत भरोसा है

साथ कोई

क्या जाएगा ,

क्या ऐसा भी

सोचा है |



किस कारण से

आए हो ,

क्या ऐसा भी

सोचा है,

जिस कारण से

जन्म लिया,

उस को क्यों

बिसराए हो |



इत उत क्यों

भागे फिरते

इस की,उस की

क्यों करते

सारा जन्म अकारथ हो

ऐसी करनी

क्यों करते |



कुछ तो ऐसा

कर जाओ

नाम अमर

करते जाओ

जीवन के चप्पे चप्पे

भेंट नज़र

करते जाओ |



राजीव जायसवाल

१७/०२/२०११

THIS POEM IS PRESENTED BELOW IN ROMAN SCRIPT------

KAUN DISHA SE

AYE HO

KAUN DISHA KO

JANA HAI

KITNE DIN KO

AYE HO

JAKAR PHIR KAB

ANA HAI

KIS KARAN SE

AYE HO

KYA KUCH LEKAR

AYE HO

KYA KUCH LEKAR

JANA HAI.



KAUN

TUMHARE SAMBANDHI

KIN JANMON KA

NATA HAI

KAHE

MOH KIYA SAB SE

SATH KOI KYA JATA HAI.



KYA AISE HI

AYE THE

JAISE

TUM AB DIKHTE HO

CHANDA SA

CHEHRA LAYE

KAJRARE

NAINA LAYE

DEVDOOT SA

BADAN MILA

PAR TUM NE

KYA HAL KIYA.





IT UT KYON

BHAGE PHIRTE

IS KI, US KI

KYON KARTE

SARA JANAM

AKARATH HO

AISE

KARAM KIYA KARTE.



KITNE

MAHAL BANAOGE

KYA

SAB MEIN

RAH PAOGE

KITNI

JAMI KHARIDO TUM

DO GAJ

JAGHA HI PAOGE.





GHAR, PATNI

BETA , NATI

SANG, SAKHA

MITWA, SATHI

SAB PAR

BAHUT BHAROSA HAI

SATH KOI

KYA JAEGA

KYA

AISA BHI SOCHA HAI.





KUCH TO

AISA KAR JAO

NAAM

AMAR KARKE JAO

JEH

KARAN SE JANAM LIYA

USKO

KYON BISRAYE HO .



RAJIV JAYASWAL

14/02/2011



तू ही तू है |


कौन पिता

कौन मात ,

कौन संग

कौन साथ ,

कौन रूप

कौन रंग ,

कौन मीत

कौन प्रीत ,

कौन जात

कौन पात ,

कौन पहर

कौन रात |



कौन देह

कौन गंध ,

कौन मुक्त

कौन बँध ,

कौन श्वेत

कौन काल ,

कौन लघु

कौन विशाल ,

कौन मृत्यु

कौन जीव ,

कौन दैत्य

कौन देव ,

कौन अनेक

कौन एक |



कौन पहर

कौन काल ,

कौन सूक्ष्म

कौन विशाल ,

कौन आदि

कौन अंत ,

कौन दुष्ट

कौन संत ,

कौन धरा

कौन चंद्र ,

कौन तीव्र

कौन मंद |



कौन स्वर्ग

कौन नर्क ,

कौन संधि

कौन विसर्ग ,

कौन प्रीत

कौन घृणा ,

कौन घटा

कौन जमा ,

कौन शब्द

कौन मौन ,

कौन बृहत

कौन गौण ,

कौन युद्ध

कौन बुद्ध ,

कौन नकल

कौन शुद्ध |



कौन गर्भ

कौन मात ,

कौन बंधु

कौन तात ,

कौन सृष्ट

कौन नाश ,

कौन शिखर

कौन नींव ,

कौन तिमिर

कौन दिया ,

कौन जीव

कौन जन्त |



कौन घड़ा

कौन कुम्हार ,

कौन जगत

कौन रचनाकार ,

कौन स्वर्ग

कौन पाताल ,

कौन काल

कौन अकाल |



तू ही तू है

तू ही तू ,

हर तरफ है

तू ही तू ,

तू ही तू है

तू ही तू |



राजीव जायसवाल

२०/०२/२०११

THIS POEM IS PRESENTED BELOW IN ROMAN SCRIPT-----

KAUN PITA

KAUN MAAT

KAUN SANG

KAUN SATH

KAUN RUP

KAUN RANG

KAUN MEET

KAUN PREET

KAUN JAAT

KAUN PAAT

KAUN PAHAR

KAUN RAAT.



KAUN DEH

KAUN GANDH

KAUN MUKT

KAUN BANDH

KAUN SHWET

KAUN KAAL

KAUN LAGHU

KAUN VISHAL

KAUN MAUT

KAUN JEEV

KAUN DAITYA

KAUN DEV

KAUN ANEK

KAUN EK.





KAUN PAHAR

KAUN KAAL

KAUN SUKSHM

KAUN VISHAL

KAUN ADI

KAUN AANT

KAUN DUSHT

KAUN SANT

KAUN DHARA

KAUN CHANDRA

KAUN TIVRA

KAUN MAND.



KAUN SWARG

KAUN NARK

KAUN SANDHI

KAUN VISARG

KAUN PREETI

KAUN GHRINA

KAUN GHATA

KAUN JAMA

KAUN SHABD

KAUN MAUN

KAUN BRIHAT

KAUN GAUN

KAUN YUDHH

KAUN BUDHH

KAUN NAKAL

KAUN SUDDH



KAUN GARBH

KAUN MAAT

KAUN BANDHU

KAUN TAAT

KAUN SHRISHT

KAUN CHINT

KAUN SHIKHAR

KAUN NEEV

KAUN MARA

KAUN JIYA

KAUN TIMIR

KAUN DIYA.

KAUN JIV

KAUN JANT



KAUN GHADA

KAUN KUMHAR

KAUN JAGAT

KAUN RACHNAKAR

KAUN SWARG

KAUN KAAL

KAUN AKAL .



TU HI TU HAI

TU HI TU

HAR TARAF HAI

TU HI TU

TU HI TU HAI

TU HI TU..



RAJIV JAISWAL

20/02/2011





क्या करूँ |


क्या करूँ

सार्थक हो जाए

ये जीवन ,

क्या करूँ

हर घड़ी हो जाए

ये पावन,

क्या करूँ

भ्रमित मन का

दूर भ्रम हो,

क्या करूँ

शुष्क मन की धरा

नम हो |



क्या करूँ

खुद को खुद से

लाज ना हो ,

क्या करूँ

मन हर घड़ी

बेताब ना हो ,

क्या करूँ

जो काम चाहूं

वो करूँ मैं ,

क्या करूँ

हो काम पूरे

जब मरूं मैं |



क्या करूँ

मुझ में रहे

विश्वास मेरा ,

क्या करूँ

ना हो कभी

उपहास मेरा ,

क्या करूँ

दौर्बल्य मन का

ना डराए ,

क्या करूँ

मन , वासना ना

डूब जाए |



क्या करूँ

इतिहास में

अमरत्व पाउँ ,

क्या करूँ

विश्वास जन जन का

मैं पाउँ ,

क्या करूँ

गत कर्म फल से

मुक्ति पाउँ ,

क्या करूँ

ये खुद को कैसे

मैं बताउँ |



राजीव जायसवाल

५/०३/२०११

जिंदगी फानी है |


सब कहते
सच नहीं
जिंदगी फानी है
सब कहते
कुछ डरो
एक दिन आनी है |

फानी है
तो फानी है
क्या करना है
मरने से पहले
सोच क्यों मरना है |

सब कहते
जग सपना है
ना अपना है
सब कहते
जग तृष्णा ने
ना मिटना है |

सपना है
तो सपना
बहुत सुहाना है
तृष्णा है तो
इस को किसे बुझाना है |

सब कहते
जग माया
खेल खिलोना है
सब कहते
इस काया को
जल जाना है |

माया है
तो माया में
सुख पाना है
जलना है
तो जल कर
नव तन पाना है |

राजीव जायसवाल
१७/०७/२०११

क्या किया दिन भर |


क्या किया दिन भर

बताओ क्या किया,

ऑफिस गये,

कुछ पेज

काले कर दिए,

कुछ नोट

फाइल पर दिए,

कुछ को ठगा,

कुछ से ठगे,

और

घर को वापिस आ गये,

क्या किया दिन भर

बताओ क्या किया |



क्या किया दिन भर

बताओ क्या किया,

सुबह सवेरे

उठ गये,

फिर एक प्याला चाय पी,

योगा किया,

पूजा करी,

अरदास की,

अख़बार की खबरें पढ़ीं,

घर वालों से

चख चख करी,

कुछ दोस्तों से बात की,

क्या किया दिन भर

बताओ क्या किया |



क्या किया दिन भर

बताओ क्या किया,

सुबह उठे

देखी घड़ी

उठने में देरी हो गयी

हर काम में फिर हड़बड़ी

बच्चों को भेजा स्कूल को

पति देव ऑफिस को चले

ना कामवाली आई है,

आराम की ना एक घड़ी,

क्या किया दिन भर

बताओ क्या किया |



क्या किया दिन भर

बताओ क्या किया

क्या दिन यूँही कट जाएँगे

जो काम नित

हम कर रहे

ऐसे ही करते जाएँगे

एक रोज

हम मर जाएँगे

कुछ नया ना कर पाएँगे |

क्या किया दिन भर

बताओ क्या किया |



राजीव जायसवाल

१०/०३.२०११

होती सुबह, शाम आती है

जाती शाम, सुबह आती है,

मेरे मन की पीड़ा भी बस

साथ साथ बढ़ती जाती है |



कौन था वो


कौन था वो

छोटा सा

चार पाँव चलता था

गिरता था

संभलता था

माता की गोदी में

रोता और मंचलता था

मैं ही था |



कौन था वो,

सुबह, स्कूल प्रार्थना में

गाता था,

साथियों के साथ

रोज पहाड़े सुनाता था,

मैं ही था |



कौन था वो,

हो के बड़ा

सुंदरता तकता था,

प्रेमिका के ख्यालों में

कविताएँ लिखता था,

मैं ही था |



कौन था वो,

प्रियतमा को

घर ले के आया था,

सारी रात जगता था,

एक पल ना

थकता था,

मैं ही था |



कौन था वो,

पैसा और पैसा

कमाता था,

कभी इधर, कभी उधर

चक्कर लगाता था,

शोहरत के, ताक़त के

सपने सजाता था,

मैं ही था |



कौन था वो

पहले सी ताक़त ना पाता था,

थोड़ी सी मेहनत से

ज़्यादा थक जाता था,

हसरतें हज़ारों थीं

कर कुछ ना पाता था,

मैं ही था |



कौन था वो

जीवन भर

माया से, काया से,

दौलत से, शोहरत से

मुक्ति ना पाता था,

एक दिवस

छोड़ सभी,

दूर चला जाता था,

मैं ही था |



राजीव जायसवाल

२७/०३.२०११











जब हम ना थे , तुम ना थे


जब हम ना थे

तुम ना थे

दादे - परदादे थे,

उन के भी

सुख दुख थे,

राग थे, विराग थे,

सुख और संताप थे,

घर और परिवार थे,

सपनों के संसार थे,

जब हम ना थे

तुम ना थे |



रेल ना थे

यान ना थे,

सुख के सामान

ना थे,

आज से आराम ना थे,

वे कैसे जीते थे,

जब हम ना थे

तुम ना थे |



हवा में

जब जहर ना था,

प्रदूषण का

कहर ना था,

तारे साफ दिखते थे,

पानी

ना बोतल में बिकते थे,

हर तरफ

हरियाली थी,

सड़क ना थी

कार ना थी,

आज के जीवन सी

मारामार ना थी,

क्या जीवन में उन के

खुशहाली थी

जब हम ना थे

तुम ना थे |



खेत या खलिहान में,

या किसी दुकान में,

या किसी व्यापार में,

राजा के दरबार में ,

रोज वे जाते होंगे,

पैसे कमाते होंगे ,

ज़मीन या मकान में,

या किसी कारोबार में,

पैसे लगाते होंगे,

कभी कमाते होंगे,

कभी गँवाते होंगे,

जैसे हम रोते हैं,

जैसे हम हंसते हैं,

वैसे वे हंसते होंगे,

वैसे वे रोते होंगे |

जब हम ना थे

तुम ना थे |



जीवन का चक्र

यूँ ही

कब से चलता आया है,

यूँ ही

चले जाएगा,

एक दिवस

ऐसा भी आएगा,

जब हज़ारों साल बाद

यही गीत कोई गाएगा,

सिर्फ़

पात्र बदल जाएँगे,

आज वर्तमान हम हैं,

कल पूर्वज कहलाएंगे |

राजीव जायसवाल

०२/०४/२०११





शनिवार, 16 जुलाई 2011

उस क्यों भूला |


उस क्यों भूला

जो सदा सहाइ,

उस क्यों भूला

जो पित, माता, भाई,

उस क्यों भूला

जो सदा ही देता,

उस क्यों भूला

जो कुछ ना लेता |



उस क्यों भूला

जो प्राण आधारा,

उस क्यों भूला

जो संग सहारा.

उस क्यों भूला

जो हर पल साथा,

उस क्यों भूला

जो अंग अंग व्यापा |



उस क्यों भूला

जिन गर्भ में पाला,

उस क्यों भूला

जिन जीवन डाला,

उस क्यों भूला

जो हृदय में धड़के,

उस क्यों भूला

जो नयन में फड़के |



उस क्यों भूला

जो जगत का स्वामी,

उस क्यों भूला

जो अंतर्यामी,

उस क्यों भूला

जो घट घट व्यापे,

उस क्यों भूला

जो दुर्गुण ढापे |



उस क्यों भूला

जो पल पल पाले,

उस क्यों भूला

जो सदा दयाले,

उस क्यों भूला

जो अगम, अगोचर,

उस क्यों भूला

जो सखा , सहोदर |



राजीव जायसवाल

०८/०४/२०११

जो दुख भंजन, प्राण आधारा

ते सिमरो मन, बारंबारा |







लोग ही लोग |


सुंदर लोग

काले लोग,

धूर्त लोग

मतवाले लोग,

पावन लोग

लांछित लोग,

मूरख लोग

ज्ञानी लोग,

भोग , रोग से

लिपटे लोग,

योगी लोग

तपस्वी लोग |



दुर्बल लोग

बलशाली लोग ,

भोले लोग

विषैले लोग ,

शोषक लोग

पीड़ित लोग ,

सूफ़ी लोग

नशेड़ी लोग ,

प्रेमी लोग

उखड़े लोग ,

चतुर लोग

अनाड़ी लोग ,

पढ़ाकू लोग

खिलाड़ी लोग |



भंजक लोग

पुजारी लोग ,

निंदक लोग

बलिहारी लोग ,

डाकू लोग

सिपाही लोग ,

साधारण लोग

अधिकारी लोग ,

ग्राहक लोग

व्यापारी लोग |

रोते लोग

हंसते लोग

चुप से लोग

बकते लोग |



इधर भी लोग

उधर भी लोग

कहाँ से आए

इतने लोग

कहाँ को जाएँ

इतने लोग

जहाँ भी देखें

लोग ही लोग

कौन बनाता

ये सब लोग

कौन मिटाता

ये सब लोग |



राजीव जायसवाल

२०/०४/२०११



सब तरफ लोग, लंबे, नाटे, पतले , मोटे, गोरे , काले | कौन बनाता है, इन सब लोगों को |

सच कहना |


सच कहना

मौन ना रहना

क्या कभी

ग़लत कुछ किया नहीं

क्या कभी

छुप के सुख लिया नहीं

सच कहना

मौन ना रहना |



सच कहना

मौन ना रहना

क्या कभी

ऐसा कुछ किया नहीं

कुछ लिया किसी से

दिया नहीं

सच कहना

मौन ना रहना |



सच कहना

मौन ना रहना

ऐसा कुछ छुप कर

किया नहीं

जो ज़िक्र किसी से

किया नहीं

सच कहना

मौन ना रहना |



सच कहना

मौन ना रहना

धोखा दे अपने मीता को

कभी प्रीत किसी से

किया नहीं

सच कहना

मौन ना रहना |



सच कहना

मौन ना रहना

ये काम किया

वो काम किया

ना एक दिन भी

आराम किया

जिस कारण जग में आए थे

वो काम

अभी तक किया नहीं

सच कहना

मौन ना रहना |



राजीव जायसवाल

१९/०४/२०११

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

आँख भर के |


आँख भर के

देख लें किस को

दूर है वो

था देखना जिसको |



आँख भर के

देख लो हम को

क्या पता

खो जाएँ

हम कल को |



आँख भर के

आँख में भर लो

कितने दिन

हम रहें

बिन घर के |



आँख भर के

ना हमें देखो

आँख भर आएगी

अपनी भी

जा ना पाएँगे

फिर कभी घर को |



आँख भर के

नीर बहने दो

सब हृदय की

पीर बहने दो |



आँख भर के

तुम को देखेंगे

आज जी भर

आँख सेकेंगे

कल कहाँ तुम हो

कहाँ हम हों

आज तुम हम को

हम तुम को देखेंगे |



राजीव जायसवाल

२४/०४/२०११

मैं भी इन में एक हूँ |


आ रहे है, जा रहे हैं

खा रहे हैं, पी रहे हैं

मर रहे हैं,जी रहे हैं

उठ रहे हैं, गिर रहे हैं

मैं भी, इन में एक हूँ |



घर को भागे जा रहे हैं

गाड़ियाँ चला रहे हैं

बस में लदे जा रहे हैं

पसीने से तरबतर हैं

फिर भी मुस्कुरा रहे हैं

मैं भी इन में एक हूँ |



मंदिरों में जा रहे हैं

घंटियाँ बजा रहे हैं

मोदकों का भोग लगा

प्रभु को रिझा रहे हैं

मैं भी इन में एक हूँ |



दुख में याद कर रहे हैं

सुख में भूले जा रहे हैं

भोग में विलास में

जिंदगी गँवा रहे हैं

जिंदगी का अर्थ

बिना जाने जिए जा रहे हैं

मैं भी इन में एक हूँ |



राजीव जायसवाल

६/०५/२०११

मैं हूँ ही नहीं |


मैं हूँ ही नहीं

तुम ही हो

मैं बूँद जल की

तुम हो सागर

तुम में मिल

मैं गया खो

मैं हूँ ही नहीं

तुम ही हो |



तुम ही मन हो

आत्मा हो

तुम ही नयन हो

भावना हो

तुम ही हृदय हो

कामना हो

शोक हो तुम

खुशी भी हो

मैं हूँ ही नहीं

तुम ही हो |



चेतना तुम

कामना तुम

तुम प्रणय हो

वासना हो

बीज जीवन का

गर्भ में हो

प्रसव की पीड़ा हो तुम

शिशु की क्रीड़ा

तुम्हीं हो

मैं हूँ ही नहीं

तुम ही हो |



प्रार्थना हो

अर्चना हो

भोर की तुम

लालिमा हो

रात्रि की तुम

कालीमा हो

तुम ग्रीषम हो

तुम ही शरद हो

मेघ की तुम

गर्जना हो

वृष्टि की तुम

बरसना हो

नींद तुम हो

तुम जागना हो

मैं हूँ ही नहीं

तुम ही हो |



धर्म तुम हो

पाप तुम ही हो,

तुम रुदन हो

उपहास तुम ही हो,

मौन हो

आलाप तुम ही हो,

बोलता जो मौन में

अनहद नाद ,

तुम ही हो

रुदन तुम,

अट्टहास तुम ही हो

मैं हूँ ही नहीं

तुम ही हो |



राजीव जायसवाल

१२/०५/२०११















गुरुवार, 14 जुलाई 2011

मैं अगर तुम होता, |


मैं अगर

मैं ना होता

तुम होता,

तो क्या होता

मेरे सुख दुख और होते ,

तेरे सुख दुख और होते ,

मेरा घर होता तुम्हारा

और तुम्हारा होता मेरा |



तुम्हारे दर्द सारे

मेरे होते ,

और तुम्हारे

होते मेरे ,

सुख तुम्हारे भोगता मैं

मेरे तुम भोगते ,

माता, पिता, पत्नी, पति

सब बदल जाते ,

मैं अगर मैं ना होता

तुम अगर तुम ना होते |



किसलिए मैं

तुम नहीं हूँ ,

किसलिए तुम

मैं नहीं हो ,

मुझ में, तुम में

भेद क्यों है ,

मेरे सुख दुख

मेरे क्यों हैं ,

तेरे सुख दुख

तेरे क्यों हैं ,

क्या सिर्फ़ संजोग है ये

कौन करता फ़ैसला ये |



गर्मी में रिक्शा चलाता

पसीने से तरबतर हो ,

पेड़ तले सो जाता ,

तुम सोते मेरे घर

आराम से ,

तुम अगर मैं होते

मैं अगर तुम होता |



हाथ मेरे फैले होते

माँगने को ,

कोई देता

कोई दुतकार देता ,

होता मैं याचक

तुम होते देने वाले ,

किसलिए मैं देने वाला हूँ

माँगते भीख तुम

कौन करता फ़ैसला ये |



कौन क्या होगा

कैसा होगा ,

किस के घर में

पैदा होगा ,

क्या करेगा

सुख सहेगा ,

दुख सहेगा

कब मरेगा ,

कितने दिन जिंदा रहेगा

कौन है वो

फ़ैसला करता है जो |

राजीव जायसवाल

२७/०५/२०११

बस कविता मुझ को अर्पण करना |


जिस दिन मैं जाउँगा

उस दिन सूरज निकलेगा क्या

उस दिन भी फूल खिलेंगे क्या

उस दिन बदरा छाएँगे क्या

उस दिन पंछी गाएँगे क्या |



सब कुछ होगा उस दिन भी

ना देख सकूँगा मैं कुछ भी

मैं आँख मूंद सो जाउँगा

चिर निद्रा में सो जाउँगा

फिर जाग कभी ना पाउँगा |



मुझ से मिलने आएँगे सब

उन को ना देख सकूँगा तब

मुझ को तय्यार करेंगे सब

मैं अंतिम बार सजुंगा जब

शिंगार खुद ना कर पाउँगा

जब अंतिम यात्रा जाउँगा |



सब राम राम कह गाएँगे

कांधे पर मुझे उठाएँगे

मेरी तारीफ करेंगे सब

मुझ को सब याद करेंगे तब

मुझ को जब विदा करेंगे सब |



नश्वर शरीर जलाएँगे

घी, धूप, कपूर लगाएँगे

मैं पॅंचतत्व में जाउँगा

इस रूप कभी ना आउँगा

मेरी कविताएँ पढ़ना सब

ना भूल मुझे तुम जाना सब |

|

चौथा करो या तेरहवी करना

वेद मंत्र, गीता ना पढ़ना

बस मेरी कविता गायन करना

ना ही मेरा तर्पण करना

बस कविता मुझ को अर्पण करना |



राजीव जायसवाल

१४/०७/२०११



















क्या छुपा रही हो |


क्या छुपा रही हो

क्यों इतना

मुस्कुरा रही हो

नयन के आसुओं को

ना दिखा रही हो

हुआ क्या है

दर्द क्या है

क्यों अकेले सहे जा रही हो |



ना कहोगी क्या

यूँ चुप रहोगी क्या

कुछ तो बोलो

दिल का दर्द खोलो

हम से मिल कर

कहो सब कुछ

तुम्हारा दर्द कम हो

हमारी आँख नम हो

चुप रहो ना

कहो, हम से कहो ना |



राजीव जायसवाल

12/06/2011

बुधवार, 13 जुलाई 2011

एक बुद्ध था |


एक बुद्ध था

राजा का बेटा था

वैभव में पलता था

प्यारी सी पत्नी थी

छोटा सा बच्चा था

रोग था, ना शोक था

दुख था ना दर्द था |



एक दिन बीमार दिखा

मरने को तैयार दिखा

वृद्ध दिखा , असहाय दिखा

करता हाय -हाय दिखा

ऐसा कुछ हो गया

विचारों में खो गया

दुख ना हो, शोक ना हो

ज़रा ना हो, मौत ना हो

कुछ ऐसा कर जाउ

इन प्रशनों से उबर जाउँ

जन्म ना हो, मरण ना हो

अवांछित कर्म ना हो

सत्य की तलाश करूँ

दुविधा का नाश करूँ |



राज महल छोड़ चला

पत्नी को, बच्चे को

मात पिता अपने को

सोते में छोड़ चला

करने जगत का भला |



दर दर भटकता रहा

सुबह चला शाम चला

उपवन चला, शमशान चला

सत्य की तलाश चला

करने जगत का भला |



पूजा उपवास किया

संतों का साथ किया

फिर भी ना ज्ञान मिला

सत्य का समान मिला

थक कर आराम किया

वृक्ष तले ध्यान किया

जीवन का ज्ञान लिया

सुख क्या है, दुख क्या है

मन की अवस्था है

दुख सोचा दुख होगा

सुख सोचा सुख होगा |



गौतम से बुद्ध हुआ

अंतरतम शुद्ध हुआ

जीवन का ज्ञान मिला

सत्य का सामान मिला|



राजीव जायसवाल

१३/०६/२०११

this poem is presented below in roman script also, for the readers , who do not know devnagri script----

Ek budhh tha

Raja ka beta tha

Vaibhav mein palta tha

pyari si patni thi

Chota sa bachha tha

Rog na tha, shok na tha

Dukh na tha, dard na tha



Ek din bimar dikha

Marne ko tayyar dikha

Vridhh dikha, ashay dikha

Karta hai hai dikha

Aisa kuch ho gaya

Vicharon mein kho gaya

Dukh na ho , shok na ho

Jara na ho , maut na ho

Kuch aisa kar jaun

In prasnon se ubar jaun

Janm na ho , maran na ho

Anvanchit karm na ho

Sukh ki talash karun

Klesh sabhi dur karun.



Rajmahal chod chala

Patni ko , bachhe ko

Mat pita apne ko

Sote hue chod chala

Karne jagat ka bhala



Dar dar bhatakta raha

Subha chala , sham chala

Upvan , shamshan chala

Satya ki talash chala

Karne jagat ka bhala.



Puja , upvas kiya

Santon ka sath kiya

Fir bhi na gyan mila

Such ka saman mila

Thak kar aram kiya

Vriksh tale dhyan kiya

Jiwan ka gyan liya

Such kya hai, dukh kya hai

Man ki awastha hai

Such socho such hoga

Dukh socho dukh hoga



Gautam se budhh hua

Antartam sudhh hua

Dhyan mein hi gyan mila

Sukh ka saman mila



Rajiv jaiswal

13/06/2011







सब विस्मय है |


सोना, जागना

चलना, फिरना

आना, जाना

खाना, पीना

मरना, जीना

मिलना, जुलना

हिलना ,डुलना

बातें करना

बातें सुनना

सपने बुनना

सब विस्मय है |



रात का होना

रात में सोना

दिवस का आना

दिवस का जाना

सूरज उगना

सूरज ढलना

चाँद चमकना

चाँद का छुपना

सब विस्मय है |



रूप सलोना

प्रीत का होना

प्रीत में खोना

हृदय धड़कना

नयन फड़कना

देह का सजना

देह का तजना

प्यार में जीना

प्यार में मरना

सब विस्मय है |



सुंदर चेहरे

गुँगे बहरे

अंधे काने

लंगडे लूले

मेघा काले

बाग में झूले

मोर का नर्तन

ख्वाब सुनहरे

सब विस्मय है |



भूख का लगना

भूख का भरना

प्यास का लगना

प्यास का बुझना

सांस का चलना

सांस का रुकना

गर्भ में आना

गर्भ से जाना

देह का सजना

देह का तजना

सब विस्मय है |



राजीव जायसवाल

१६/०६/२०११

दुनिया आनी जानी है, सकल जगत हैरानी है |

नेति नेति |


ना जनेऊ

ना केश

ना तिलक

ना भेष

ना टोपी

ना पग्ग

ना भस्म

ना राख |

ना मंदिर

ना ज्योत

ना पूजा

ना अज़ान

ना गीता

ना क़ुरान |

ना चिमटा

ना ढोल

ना कीर्तन

ना शोर

ना पंडित

ना पठान

ना हिंदू

ना मुसलमान |

ना पंथ

ना ग्रंथ

ना साधु

ना संत

ना पीर

ना मज़ार

ना मक्का

ना हरिद्वार

ना रोज़ा

ना उपवास |

ना संयम

ना सहवास

ना तीरथ

ना दान

ना गंगा स्नान |



सब जी का जंजाल

सब माया का जाल

मैं मानूं ना कोई

जो होना सो होई |



राजीव जायसवाल



२४/०६/२०११



एक पुरातन भारतीय मान्यता -नेति नेति के अनुसार सच कुछ भी नहीं है, सब मायाजाल है, सब जग रचना झूठ है |

तेरा शुक्रिया |


तेरा शुक्रिया

तूने मुझे क्या ना दिया

दर्द दिया

दिल का मर्ज़ दिया

बड़ा अहसान किया

मुझ को धोखा दिया

झूठ का फरेब का

इनाम दिया

क्या क्या ना दिया

तूने पिया

तेरी हर बात का शुक्रिया

मेरे पिया |



मुझ को बदनाम किया

रुसवा सरे आम किया

बड़ा ही काम किया

मुझ को क्या क्या ना दिया

कितने अहसान तेरे

ए सनम शुक्रिया |



दर्द का जाम दिया

दुख का सामान दिया

कैसा सम्मान दिया

ए मेरे प्यारे पिया

जला के मेरा जिया

बहुत अहसान किया

शुक्रिया, शुक्रिया

ए मेरे प्यारे पिया |



राजीव जायसवाल

२५/०६/२०११







जाओ अब ना आना


तुम जा रही हो

जाओ

अब ना आना

जितने दिन का साथ था

उतना निभाया

अब जो मिले

उस से निभाना

मुझ को भुलाना |



प्रीत तुम ने की

नहीं की

क्या पता

मैने तो की थी

दिल दिया उस को

जिस को पता क्या

प्रीत का

वफ़ा की रीत का

मन के संगीत का |



पास तुम थी

दूर खुद से हो गया था

जाओगी तुम दूर

अपने पास आउँगा

मैं अपने खुद को पाउँगा |



राजीव जायसवाल

27/06/2011













तुम हो तो |


तुम हो तो

अंधेरा

रोशनी सा लगता है

तुम हो तो

डर कोई

पास ना फटकता है

तुम हो तो

जिंदगी

जिंदा हो जाती है |



तुम हो तो

हर खुशी

मेरी हो जाती है

तुम हो तो

उदासी , फर्र से उड़ जाती है

तुम हो तो

मेरी हर रात

मुस्कुराती है

तुम हो तो

मन की हर

कली खिली जाती है |



तुम ही तुम

बस तुम

तुम में गुम

थे अब तक हम

अब तुम

जो जाओगे

वापिस भी क्या आओगे

तुम बिन हम

रहें कैसे

मुझे क्या तुम बताओगे |

राजीव जायसवाल

२९/०६/२०११



























































मंगलवार, 12 जुलाई 2011

सोच लो जाने से पहले एक बार


सोच लो

जाने से पहले एक बार

क्या मुझे करती हो प्यार

सोच लो

फिर एक बार

सब मिलेंगे

मैं ना मिलूँगा

वहाँ पर

रह सकोगी

मेरे बिन क्या

सोच लो

फिर एक बार |



भोर होगी

दिन भी होगा

रात होगी

तुम ना होगी

बस तुम्हारी बात होगी

बाग होंगे

फूल होंगे

पर तुम्हारे बिन

मुझे वो फूल नहीं

शूल होंगे |



देख लो

तुम बिन

अधूरा मैं रहूँगा

मेरे बिन

अधूरी तुम रहोगी

जमाने के सितम

तुम मेरे बिन

कैसे सहोगी

सोच लो

फिर एक बार

जाने से पहले |



राजीव जायसवाल

३०/०६/२०११



































सोमवार, 11 जुलाई 2011

मेरे मन एक बच्चा रहता है


मेरे मन

एक बच्चा रहता है

बच्चे में

एक सच्चा रहता है |

कभी जगता है

कभी है सोता

कभी है हंसता

कभी है रोता

मुझ में एक

अनोखा रहता है |



ये बच्चा

अभी तक

बचा है कैसे

बड़ा मैं हुआ

ये रहा

वैसे के वैसे

ना कोई पाप

झूठ ना कोई

क्रोध , अभिमान

काम, ना कोई

बचा ये कैसे

हैरानी होई |



मुझ को समझाए

सदा सच कहो

प्यार से रहो

जैसे आए थे

वैसे ही रहो

पाप नादिया में

कभी मत बहो |



अपने बचपन को

अपनी दौलत को

पाप कालिख से

बचा के रखना

सज़ा के रखना |



राजीव जायसवाल

०१/०७/२०११



























रोक मत जाने दे उसको |


रोक मत
जाने दे उसको
रोकने से
कुछ तुझे हासिल नहीं है
समझ ले
तू फरिश्ता है
वो तेरे काबिल नहीं है |


तू कहाँ
और वो कहाँ
वो ज़मीं
तू आसमान
तू कमल का फूल
वो चुभने वाला शूल
रोकने से कुछ उसे हासिल नहीं है
रोक मत
जाने दे उस को
वो तेरे काबिल नहीं है |
राजीव जायसवाल
०२/०६/२०११

भावना को बहने देना |



भावना को बहने देना

रोकना मत

ये मौका फिर मिलेगा

ना मिलेगा

किस को पता |



माँ

के सीने से

लिपटना

दिल करे

तो मत झिझकना

फिर ये मौका

फिर मिलेगा

ना मिलेगा

कौन जाने |



पिता जी

के चरण छूना

मन करे

तो मत झिझकना

तीर्थ सारे

पूरे किए

या ना किए

कुछ गम नहीं

सब तीर्थों से

मा पिता के चरण भी

कुछ कम नहीं |





हैं अगर जीवित

माता पिता

तो मिलते रहना

सेवा करना

झिझकना मत

किसने देखे हैं प्रभु

हो देखने तुमको

इन हीं में देख लेना

ना रहे ये तो

जन्म भर

देखने को तरसना होगा

मगर ये ना मिलेंगे |



राजीव जायसवाल

०८/०७/२०११

अब जाओ भी |


अब जाओ भी

ना जाती हो

ना जीने देती हो

ना दूर नज़र से होती हो

ना मदिरा प्रणय की

पीने देती हो |



कुछ दिन

मुझ से दूर रहोगी

तो समझोगी

मेरे प्यार की घनी छाँव

जब नहीं मिलेगी

तब समझोगी

जब कामुक नज़रों की

गर्म दोपहरी से गुज़रोगी

तब समझोगी |
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