रविवार, 2 दिसंबर 2012

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों |


चलो  फिर अजनबी बन जाएं 
जितने करीब  आए  थे दोनों 
उतने ही दूर जाएं ,
चलो 
फिर अजनबी बन जाएं ।

मैं भी भूलूं                                                                             
तुम भी भूलो 
अनजाने हो जाएं ।
जाने अनजाने 
कसमें जो खाई 
उन को भूल ही जाएं ,
चलो 
फिर अजनबी बन जाएं ।

तुम मेरे ख़त 
आग  लगा दो ,
तस्वीरें जो साथ 
जला दो ,
मेरे मन 
जो  याद  तुम्हारी
 मैं भी दफ़न कराऊँ 
न तुम मेरी याद  में आना

 
मैं भी  याद  न आऊँ ,
एक दूजे को बिसराएँ
चलो
  फिर अजनबी बन जाएं ।

राजीव 




चलो , मन के पार चलें |


चलो
आज मन के पार चलें
जहाँ
रंग  ना रूप
जहाँ
छाया ना धूप
जहाँ
घर ना परिवार
जहाँ
मेला ना त्योहार
जहाँ
मृत्यु ना रोग
जहाँ
विषाद ना सोग
जहाँ
साथी ना संग
जहाँ
काया ना अंग |
जहाँ
आदि ना अंत
जहाँ
शीत ना बसंत
जहाँ
मेघ ना मल्हार
जहाँ
काज ना व्यापार
जहाँ
माया ना जाल
जहाँ
दीन ना कॅंगाल |

जहाँ
अतुलित आनंद
जहाँ
आलोकिक छन्द
जहाँ
ओम का आलाप
जहाँ
ओंकार नाद
जहाँ
नीलाभ आकाश
जहाँ
प्रेमिल प्रकाश|

चलो
आज मन के पार चलें

राजीव
०८/०४/२०१२




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