रविवार, 20 मई 2012

जीवन से मरना भला , जो मरि जा नै कोय |


जीवित ना रहो
मृतक से   हो जाओ ,
कुछ भी ना करो ,
सिर्फ खो जाओ |

कुछ भी ना दिखे
सभी कुछ  खो जाए
सभी कुछ दिखे ,
ऐसा कुछ  हो जाए |

उजाला ना रहे ,
अँधेरा भी ना हो ,
दोपहरी  ना रहे ,
सवेरा  भी ना हो |
 |
अगन सी एक जले ,
जलन पर ना करे ,
बर्फ सी एक जमे ,
मगर शीतल ना हो |

कोई भी  गाए ना
मगर गायन सुनें ,
कोई भी नाचे ना  ,
मगर नर्तन दिखे |

साज कुछ ना बजे
मगर  कीर्तन सुनें
पास कुछ ना रहे
मगर  सब धन मिले |

कोई भी आए ना ,
मगर आगमन हो ,
कहीं भी जाएं ना ,
जगत का भ्रमण हो |
शून्य ये तन बने ,
व्यापत  कण कण में हो ,
शोक कुछ भी ना हो
मोक्ष  को प्राप्त हो |

---------------------------राजीव

जीवन से मरना भला
जो  मरि जा नै कोय |
मरना पाहिले जो म रै
अजर अमर सो होय |
---------------------------संत कबीर 















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1 टिप्पणी:

  1. कल 24/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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